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किसने तोडा हनुमान का घमंड

दोस्तों कहा जाता है कि हनुमान जी मैं लेश मात्र का भी अहंकार नहीं था। वह सर्व गुणों से संपन्न थे उन्हें सभी देवताओं का भगवान राम का व सीता माता का आशीर्वाद था। परंतु मनुष्य होने के कारण उनमें मनुष्य के गुण व अवगुण दोनों थे। धीरे धीरे उन्होंने सभी पर विजय प्राप्त कर ली। जैसे बचपन में सूर्य को फल समझ खाने का हठ। परन्तु बड़े होने पर उन्होंने हठ नहीं किया। राम जी के सामने उन्होंने स्वयं स्वीकार किया की उन्हें इस बात का घमंड हो गया था कि वह भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हैं परंतु उन्हें उनसे भी बड़ा राम भक्त मिला जिसने उनके इस अहंकार को तोड़ दिया। पूरी घटना जानने के लिए लेख पूरा पढियेगा।

जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी तो सुषेण वैद्य के कहने पर हनुमान जी हिमालय पर्वत पर संजीवनी बूटी लेने पहुंचे। लेकिन संजीवनी बूटी की पहचान ना होने के कारण वह पूरा पहाड़ ही उठा लाए। क्योंकि उनके साथ पर्वत था तो वह जब पर्वत लेकर अयोध्या के ऊपर से उड़े तो अयोध्या के नागरिक यह देखकर डर गए उन्हें लगा कि कोई राक्षस है। उन्होंने भरत जी को इसकी सूचना दी भरत जी ने एक तीर मारा और हनुमान जी नीचे गिर गए। तीर लगने के कारण हनुमान जी घायल हो गए थे। वह भगवान् राम के नाम का जाप करने लगे। भरत जी को अपनी भूल का अहसास हुआ कि उन्होंने गलती से किसी राम भक्तों पर तीर चला दिया है।
उन्होंने हनुमान जी से क्षमा मांगी। तब हनुमान जी ने उन्हें पूरी घटना का वृतांत सुना दिया, भरत ने युद्ध में शामिल होना चाहते थे परंतु वह अपने वचनों से बंधे हुए थे। उन्होंने हनुमान जी को एक तीर पर बैठाया और पर्वत समेत लंका पहुंचा दिया।

जब वह संजीवनी लेकर लंका पहुंच गए और सुषेण वैद्य ने लक्ष्मण जी को संजीवनी बूटी दे दी. तो उनके स्वास्थ्य में आराम पड़ गया। तब हनुमान जी ने भगवान श्रीराम से कहा कि आपने मुझे संजीवनी बूटी लेने भेजा था या मेरा अहंकार तोड़ने के लिए भेजा था।
हनुमान जी आगे कहते हैं मुझे यह भ्रम था कि मैंने राम नाम का जप करके आपको अपने वश में कर रखा है और मैं ही आपका सबसे बड़ा भक्त हूं। लेकिन आज मुझे मुझसे भी बड़ा राम नाम जपने वाला भक्त मिल गया।
भगवान श्री राम बोले कैसे
तब हनुमानजी ने कहा कि जब लक्ष्मण जी के लिए मैं संजीवनी बूटी लेकर आ रहा था तो भरत जी ने मुझे तीर मारकर घायल कर दिया। उन्होंने ना तो वैद्य बुलाया और ना ही संजीवनी मंगाई। उन्हें राम नाम पर पूरा भरोसा था उन्होंने कहा कि यदि मेरे वचन और शरीर में श्री राम जी के चरण कमलों का निष्कपट प्रेम है तो फिर इस वानर की पीड़ा तत्काल समाप्त हो जाए। यह वचन सुनते ही मैं श्रीराम श्रीराम कहता हुआ मैं बैठ गया मेरी साडी पीड़ा समाप्त हो गई।

मैं नाम तो लेता हूं लेकिन भरत जी जैसा भरोसा मेरे नाम में नहीं है। वरना मैं संजीवनी लेने क्यों जाता बस ऐसे ही मैं भी आपका नाम लेकर लक्मण भैया को ठीक कर देता।
उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि बाण लगने पर मैं गिरा मेरे साथ पर्वत भी गिरा। क्योंकि पर्वत आप उठाए थे और मैं अभिमान कर रहा था कि पर्वत मैंने उठा रखा है मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया। फिर हनुमान जी आगे कहते हैं कि आपके पास भी ऐसे बाण नहीं जैसे भरत भैया के पास है। आपने मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों को मार कर दूर फेंक दिया था लेकिन उनके बाण ने तो मुझे आपके चरणों में ला दिया।

हनुमान जी आगे बोले मुझे इस बात का अभिमान हो गया था कि यह बाण मुझे वहां तक कैसे पहुंच पाएगा क्योंकि एक तो मेरे पास पहाड़ था और दूसरा मेरा खुद का पहाड़ जैसा वजन। परंतु भरत जी के तीर ने मेरे इस अभिमान को भी तोड़ दिया। भरत जी की प्रशंसा संत राम जी प्रफुल्लित होकर मुस्कुरा रहे थे और उन्होंने खड़े होकर हनुमान जी को गले लगा लिया। तब तुलसीदास जी लिखते हैं रघुपति कीनी बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरता हे सम भाई। धन्यवाद दोस्तों

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